
बसहा पहाड़ी स्थित मोरिय मठ गुफा में 17वां शिलालेख महोत्सव संपन्न
सम्राट अशोक द्वारा लिखवाए गए लघु शिलालेख की ऐतिहासिक धरोहर पर उमड़ा आस्था का सैलाब
चांद (कैमूर), बिहार: तथागत गौतम बुद्ध के आगमन के लगभग 350 वर्ष पश्चात महान मौर्य सम्राट अशोक महान द्वारा मोरिय मठ गुफा में लिखवाए गए ऐतिहासिक लघु शिलालेख की स्मृति में बसहा पहाड़ी (प्रखंड चांद, जिला कैमूर) में 17वां मोरिय मठ शिलालेख महोत्सव हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। कार्यक्रम का आयोजन सम्राट अशोक क्लब, शाखा चांद (जिला इकाई कैमूर) के सौजन्य से किया गया।महोत्सव में हजारों की संख्या में धम्मानुयायियों, इतिहास प्रेमियों, श्रद्धालु महिला-पुरुषों, बच्चों और युवाओं ने भाग लिया।
कैमूर के अलावा चंदौली, बक्सर, रोहतास और मिर्जापुर सहित विभिन्न जिलों से लोग 400 फीट ऊंची बसहा पहाड़ी पर चढ़कर मोरिय मठ गुफा पहुंचे और सम्राट अशोक द्वारा लिखवाए गए ऐतिहासिक शिलालेख का दर्शन किया।मुख्य अतिथियों की गरिमामयी उपस्थितिकार्यक्रम के मुख्य अतिथि के रूप में केंद्रीय उच्च तिब्बती अध्ययन संस्थान, सारनाथ-वाराणसी के प्रो. न्गवांग तेनफेल उपस्थित रहे। मुख्य वक्ता के रूप में सम्राट अशोक क्लब भारत के राष्ट्रीय महासचिव जीवनदीप मौर्य ने संबोधित किया।

विशिष्ट अतिथि के रूप में काठमांडू (नेपाल) से विकास साक्य शामिल हुए। इसके अतिरिक्त राष्ट्रीय महाप्रबंधक डॉ. आर.पी. मौर्य तथा प्रदेश उपाध्यक्ष सिद्धनाथ मौर्य की गरिमामयी उपस्थिति रही।वक्ताओं ने “विश्व शांति एवं भाईचारा स्थापित करने में सम्राट अशोक के शिलालेखों की प्रासंगिकता” विषय पर अपने विचार रखते हुए कहा कि अशोक के धम्म संदेश आज भी मानवता को सत्य, अहिंसा और करुणा का मार्ग दिखाते हैं।
उन्होंने कहा कि अशोक के शिलालेख केवल पत्थरों पर अंकित शब्द नहीं, बल्कि मानव सभ्यता के नैतिक मूल्यों का अमिट दस्तावेज हैं।ऐतिहासिक पृष्ठभूमिइतिहासकारों के अनुसार लगभग 2500 वर्ष पूर्व साक्य गणराज्य के राजकुमार गौतम बुद्ध ने बोधगया में ज्ञान प्राप्ति के बाद सारनाथ की यात्रा के क्रम में इस गुफा क्षेत्र में विश्राम किया था। इसी ऐतिहासिक स्मृति को चिह्नित करने हेतु सम्राट अशोक ने अपनी धम्म यात्रा के दौरान बसहा पहाड़ी की गुफा में विश्राम करते समय अपने लिपिकारों एवं सैनिकों के साथ यहां पाली भाषा में नौ पंक्तियों का लघु शिलालेख खुदवाया था।
बताया जाता है कि यह शिलालेख चट्टानी दीवार पर लोहे की कलम से अंकित कराया गया था, जिससे “लिख लोहा, पढ़ल पत्थर” की कहावत चरितार्थ होती है। यद्यपि समय के साथ शिलालेख आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त हुआ है, फिर भी वह आज अपने मूल स्वरूप में विद्यमान है और संरक्षण की आवश्यकता महसूस कर रहा है।गुफा में वह पत्थर भी मौजूद है, जिसके बारे में जनश्रुति है कि सम्राट अशोक ने वहां 256वीं रात्रि विश्राम किया था। श्रद्धालु उस पत्थर को स्पर्श कर गौरव और भावनात्मक जुड़ाव का अनुभव करते हैं।देश-विदेश से पहुंचते हैं श्रद्धालुइस ऐतिहासिक स्थल के दर्शन के लिए समय-समय पर देश-विदेश से बौद्ध भिक्षु, धम्म प्रेमी, पर्यटक और शोधार्थी पहुंचते रहते हैं।

आयोजन समिति के अनुसार इस महोत्सव को वैश्विक पहचान दिलाने की दिशा में लगातार प्रयास किए जा रहे हैं।संरक्षण की मांगसम्राट अशोक क्लब भारत, शाखा बिहार, जिला इकाई कैमूर ने भारत सरकार के पुरातत्व विभाग एवं कला एवं संस्कृति विभाग से मांग की है कि इस गौरवशाली ऐतिहासिक धरोहर को सुरक्षित एवं संरक्षित किया जाए, ताकि भारत की प्राचीन सभ्यता और संस्कृति की पहचान विश्व पटल पर और सुदृढ़ हो सके।महोत्सव के अंत में आयोजकों ने सभी आगंतुकों, सहयोगियों एवं धम्मानुयायियों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि उनके तन-मन-धन से सहयोग के कारण यह आयोजन निरंतर भव्य रूप ले रहा है।
( कैमुर से अफसार आलम की रीपोर्ट)
