
होलिका दहन पर पर्यावरण संरक्षण का संदेश, प्रदूषणमुक्त उत्सव मनाने की अपील
कैमूर, 1 मार्च 2026।होलिका दहन भारतीय संस्कृति, आस्था और परंपरा का प्रतीक पर्व है, जो बुराई पर अच्छाई की विजय का संदेश देता है। लेकिन बदलते समय के साथ इस पावन अवसर पर बढ़ते प्रदूषण को लेकर चिंता भी गहराती जा रही है। प्लास्टिक, रबर, थर्माकोल, टायर, मोबिल ऑयल एवं अन्य प्रदूषणकारी सामग्रियों के उपयोग से वायु गुणवत्ता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है, जिससे मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण दोनों पर गंभीर खतरा मंडरा रहा है।
इसी संदर्भ में पर्यावरण प्रेमी शिवम कुमार ने लोगों से जागरूकता और जिम्मेदारी का परिचय देने की अपील की है। उन्होंने कहा कि होलिका दहन हमारी आस्था और सांस्कृतिक विरासत का पर्व है, इसे प्रदूषण का कारण नहीं बनने देना चाहिए। प्लास्टिक एवं रासायनिक पदार्थों के जलने से निकलने वाली जहरीली गैसें जैसे पीएम 2.5, पीएम 10, कार्बन मोनोऑक्साइड और सल्फर डाइऑक्साइड वातावरण को दूषित करती हैं।
इन गैसों के कारण सांस संबंधी रोग, एलर्जी, आंखों में जलन और हृदय रोग जैसी समस्याएं बढ़ सकती हैं।शिवम कुमार ने बताया कि यदि होलिका दहन प्राकृतिक एवं जैविक सामग्रियों जैसे सूखी लकड़ी, उपले और पेड़-पौधों की सूखी टहनियों से प्रतीकात्मक रूप में किया जाए तो प्रदूषण को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
उन्होंने लोगों से अपील की कि वे अनावश्यक रूप से बड़े-बड़े अलाव न जलाएं और पर्यावरण के अनुकूल तरीके से उत्सव मनाएं।उन्होंने कहा कि हम अपनी प्रकृति और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी निभाएं। युवाओं और सामाजिक संगठनों को आगे आकर जन-जागरूकता अभियान चलाना चाहिए, ताकि लोगों में पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता बढ़े। स्कूलों, कॉलेजों और पंचायत स्तर पर भी स्वच्छ और हरित होली के संदेश को प्रसारित किया जाना चाहिए।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि पर्यावरण संरक्षण केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक का नैतिक दायित्व है। यदि हम छोटे-छोटे प्रयास करें तो बड़ा बदलाव संभव है।अंत में उन्होंने आह्वान किया, “आइए, इस होलिका दहन पर हम सब संकल्प लें कि उत्सव भी मनाएँगे और पर्यावरण भी बचाएँगे। स्वच्छ, हरित और स्वस्थ समाज के निर्माण में अपनी सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करें।”
( कैमुर से अफसार आलम की रीपोर्ट)
