रक्तहीन बली की अनोखी परंपरा मां मुंडेश्वरी मंदिर बना आस्था का केंद्र

क्तहीन बली की अद्भुत परंपरा: मां मुंडेश्वरी मंदिर में उमड़ रही श्रद्धा, राम नवमी पर विशेष आकर्षण

कैमूर (भभुआ), दिनांक:बिहार के कैमूर जिले के भगवानपुर प्रखंड स्थित पहाड़ी पर विराजमान मां मुंडेश्वरी मंदिर देश के प्राचीनतम मंदिरों में गिना जाता है। यह मंदिर न केवल अपनी ऐतिहासिक महत्ता के लिए प्रसिद्ध है, बल्कि यहां होने वाली अनोखी “रक्तहीन बली” की परंपरा भी इसे देशभर में विशिष्ट पहचान दिलाती है।मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां बकरे की बली दी जाती है, लेकिन इसमें रक्त की एक बूंद भी नहीं गिरती।

मान्यता है कि जब पुजारी द्वारा बकरे पर फूल और अक्षत डाला जाता है, तो वह कुछ समय के लिए मूर्छित हो जाता है। इसके बाद उसे फिर से जीवित अवस्था में छोड़ दिया जाता है। इस अनोखी परंपरा को देखने और मां के चमत्कार के साक्षी बनने के लिए देश के कोने-कोने से श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं।इतना ही नहीं, मंदिर में स्थापित देवी प्रतिमा के दिन में चार बार रंग बदलने की मान्यता भी भक्तों के बीच गहरी आस्था का केंद्र है।

इस अद्भुत दृश्य को देखने के लिए दूर-दूर से लोग यहां आते हैं और माता के दर्शन कर अपनी मनोकामनाएं मांगते हैं।इन दिनों राम नवमी के अवसर पर मंदिर में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ रही है। भक्त सुबह से ही लंबी कतारों में खड़े होकर मां मुंडेश्वरी के दर्शन कर रहे हैं। पूरे क्षेत्र में भक्ति और उत्साह का माहौल बना हुआ है।मंदिर प्रशासन द्वारा आगंतुकों की सुविधा का विशेष ध्यान रखा जा रहा है। श्रद्धालुओं के लिए पेयजल, सुरक्षा, स्वच्छता और अन्य आवश्यक व्यवस्थाएं सुनिश्चित की गई हैं, ताकि किसी भी भक्त को असुविधा का सामना न करना पड़े।

मां मुंडेश्वरी मंदिर अपनी प्राचीनता, रहस्यमयी परंपराओं और अटूट आस्था के कारण आज भी श्रद्धालुओं के लिए आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। यहां की अनोखी परंपराएं और धार्मिक मान्यताएं इसे देश के अन्य मंदिरों से अलग और विशेष बनाती हैं।

( कैमुर से अफसार आलम की रीपोर्ट)

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